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Showing posts from January, 2026

आशुतोष

शिव को तो नही भजा मैंने  फिर भी आशुतोष मिला  चंचल गंगा सी में... उसने उन्मुक्त अपने शीश रखा  बांध कर बंधन में मुझकों फिर भी आजाद रखा  उठते होंगे कई सवाल उसके मन मे भी फिर भी उसने खुद को खामोश रखा  बातें दुनियां दारी की सब समझ आती है उसको फिर भी उसने खुद को दर किनार रखा 

कमल

कमल पुष्प राजी प्रिय प्यारी अष्ठ दल की शोभा निरखु जाउ वारी वारी श्री राधिका जी के प्रिया सांझी उत्सव की बधाई  मनवांछित फल पाइए जो कीजे इहि सेव।  सुनो कुंवरि वृषभान की यह साझी सांचौ देव।

फ़ागुन

खेलत रहो फ़ाग मेरी अखियन के आगे कबहू कुंजन कबहू निकुंजन रह्यो प्रेम रस माते गोपयन सम्मुख खेलत होरी केसर अबीर पट बाँधे  फ़ागुन मास लगत अति प्यारो मिटत ताप जियरा के

कब दरशन पाऊ

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किशोरी कब तुम्हरें दर्शन पाऊ जग की सताई कीत में जासी चरण रज मिल जाऊँ। लोग हँसत दिन रैन मै रोऊ द्वार तिहारे बस जाऊं। कहनी थी जो बात ह्दय की तुम्हरे मुख सुन पाऊँ। नख शिख ज्योति देख सर्वस्व हारी दरश बिना ना  मर जाऊँ गुरुदेव को हो तुम प्राणधन प्यारी भान अली ह्दय बीच बसाऊँ।

दर

इस तलब की इंतिहा इतनी कर दे पलक झपकूँ तो मुझे तू दिखाई दे तमाम शिकायतों के बाद भी मुझे सिर्फ तू चाहिए हर दिन जब याद आती है मुझे तेरी एक पल ही सही याद तो तूने भी किया होगा। तूने ही सिखाया है हर दर पर झुकना मुझे हर दर पे मैं मांगा नहीं करती। छोड़ दिया मैने शिकायतें, मिन्नतें, करना अब क्या तुझे पता नही मुझें क्या चाहिए। झूठी ही सही तसल्ली तो दे जल्दी मिलूंगा इतना कह दे