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तुम बिन

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तुम बिन नैना दुखन लागे रोवत निस दिन फिर ये जागे आये परु मैं शरण मे तेरी.... ऐसे भाग कब मेरे जागे 'भान अली' ढूढ़े कुंज गली में कहवत सखी वंशी वट ठाड़े।    मन्दिर मन्दिर  मैं ना खोजूं संतन बीच बैठे तुम रसमाते।

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ना दिन थम रहें ना रात थम रही हैं उम्मीदें मेरी फिर क्यों पल रही हैं बिखर सी गई है जिंदगी मेरी.... ये सांसे बेमतलब सी चल रही है।