आशुतोष
शिव को तो नही भजा मैंने
फिर भी आशुतोष मिला
चंचल गंगा सी में...
उसने उन्मुक्त अपने शीश रखा
बांध कर बंधन में मुझकों
फिर भी आजाद रखा
उठते होंगे कई सवाल उसके मन मे भी
फिर भी उसने खुद को खामोश रखा
बातें दुनियां दारी की सब समझ आती है उसको
फिर भी उसने खुद को दर किनार रखा
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