नोका के बीच
सखी री मैंने देखे नोका के बीच
निरख रही मैं तो लई यमुना में खींच।
तोड़ कमल उछालता जल को
सखी सगरी गई मैं भीज।
कबहु निरखत हँस बतरावे
आँख मिचौली खेलत जमुना बीच
पकर लई और कसी अंक में
अब ना रही कोई टीस…...
भान अली गुरुदेव कृपा करो
निस दिन बढ़े जे प्रीत।
Comments
Post a Comment